
Iran-Taliban करीब आये (बड़ा लेख)
Islamic अमीरात ऑफ Afghanistan (Talibans शासित अफगानिस्तान) के सूचना और संस्कृति मंत्रालय ने उन किताबों की एक सूची जारी की है जिन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।
इसमे ‘किताब अल-तौहीद’ भी शामिल है।
इस कदम से Iran और Taliban और करीब आये हैं।
यह Afghanistan और समग्र रूप से Islam के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि इससे पता चलता है कि तालिबान वहाबीवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख अपना रहा है और मुख्यधारा इस्लाम की ओर कदम बढ़ा रहा है।
किताब अल-तौहीद 18वीं सदी के Islamic विद्वान मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब की एक प्रसिद्ध कृति है। वहाबी धारा अधिकांश आतंकवादियों की जड़ में है। 20वीं और 21वीं सदी में उभरे समूह, जैसे ISIS, अल-नुसरा और अल-कायदा यहीं से निकले हैं।
मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब एक अति-कट्टरपंथी सुधारक थे, जिन्होंने इब्न तैमियाह जैसे पहले के विद्वानों के कार्यों का विस्तार करते हुए ‘इस्लाम को उसकी मूल स्थिति में लौटाने’ की मांग की थी। इनका सुन्नीयों मे सबसे ज्यादा विरोध हुआ था।
1744 में, मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने दिरिया के अमीर, इमाम मुहम्मद बिन सऊद के साथ एक समझौता किया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः 1932 में सऊदी अरब साम्राज्य की स्थापना हुई।
इस समझौते में, सऊद के घर ने अपने राज्य के भीतर और अपनी सीमाओं के बाहर इस्लाम के वहाबी सिद्धांत को लागू करने और विस्तार करने पर सहमति व्यक्त की, जिसके बदले में वहाबी आंदोलन से जुड़े इस्लामी विद्वानों ने हेजाज़ पर सऊद के शासन की वैधता की गारंटी दी।
वहाबीवाद को पश्चिम, विशेष रूप से Britain का समर्थन प्राप्त था, क्योंकि ये विचारधारा ज्यादातर साथी मुसलमानों को विभाजित करने और उनकी आलोचना करने पर केंद्रित थी। इसमे साम्राज्यवाद (Imperialism) और उपनिवेशवाद (colonialism) के खिलाफ विद्रोह नही था।
20वीं सदी के अंत से, यह नई चरमपंथी विचारधारा दुनिया भर में फैल गई, Saudi तेल के पैसे से वित्त पोषित और पश्चिम द्वारा समर्थित, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिस्र, ट्यूनीशिया और अन्य देशों में मदरसों (इस्लामिक सेमिनरी) को भर दिया गया।
वहाबी विद्वानों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई जिसने जनता को प्रभावित किया और लाखों मुसलमानों को मुख्यधारा Islam से दूर कट्टरपंथी विचारों की ओर ले जाया। इसने आधुनिक युग में ‘इस्लामिक’ आतंकवाद की नींव रखी।
1744 से आज तक, दिरिया का समझौता बरकरार है। वहाबीवाद अभी भी सऊदी अरब के अंदर सबसे प्रचलित इस्लामी विचारधारा है। यदि आपने ‘सलाफ़ीवाद’ के बारे में सुना है, तो यह वहाबीवाद का पुनः ब्रांडेड नाम है। Syria मे America Israel समर्थित HTS भी सलाफी है।
वहाबीवाद और सलाफीवाद America और Israel के खिलाफ नही बोलता। बल्कि मुसलमानो को ही मुसलमानो का सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। Syria HTS का Jolani इसीलिए Israel के प्रति नर्म है। और Iran और Axis of Resistance के खिलाफ है।
वहाबीवाद और सलाफीवाद का भारत के देवबंदी स्कूल से कोई संबंध नही है। देवबंद Shah Waliullah की क्रांतिकारी
विचारधारा मानता है। Shah Waliullah के पुत्र Shah Abdul Aziz ने 1803 मे Hindu-Muslim एकता का फतवा जारी कर 1857 भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।
1857 मे अंग्रेजों ने भारतीय मुस्लिम क्रांतिकारियों को जानबूझकर ‘वहाबी-वहाबी’ कहना शुरू किया ताकि उन्हे बदनाम किया जा सके। दरअसल Maulvi Ahmadullah Shah, Haji Imdadullah और लाखों मौलवी जो 1857 मे शहीद हुए, ‘वलीउललाहवादी’ थे, वहाबी नहीं।
बीसवीं सदी के क्रांतिकारी जैसे Maulvi Barkatullah, Sheikhul Hind, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, जमीयत-उलेमा हिंद आदी, वलीउललाहवादी थे, वहाबी नही!
Taliban भी वलीउललाहवादी ही है, वहाबी नही।
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